पंजाब मे दालितो का खेत के लिए संघर्ष, अब दालित महिलाओ ने पकडी कमान, शुरु किया ये आंदोलन…

अपनी रसोई के दरवाजे पर खड़े होकर,रोटी बनाने के लिए आटा गूंधते हुए परमजीत कौर कहती हैं, “हमारा संघर्ष सिर्फ पैसे के लिए नहीं है।

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यह एक खेत के मालिकाना हक के बारे में है, जहां हम बिना किसी डर के जा सकते हैं। अब, हमारी बेटियां किसी भी समय चारे की कटाई के लिए अकेली जा सकती हैं।”

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यह परिवार दक्षिणी पंजाब के 70 गांवों में व्यापक भूमि अधिकार आंदोलन में भाग लेने वाले कई हजार दलितों में शामिल हैं, जो सवर्ण किसानों और अनुसूचित जाति (एससी) के मजदूरों के बीच गहराई से उलझे सत्ता समीकरण को लेकर परेशान हैं।

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परमजीत कौर 15.5 एकड़ आम जमीन के बारे में बात कर रही थी, जिसकी देखभाल वह गांव के 200 अन्य दलित परिवारों के साथ मिलकर कर रही हैं और जिससे प्रति परिवार को 2.5 क्विंटल गेहूं और 1,200 रुपये का वार्षिक लाभ मिलता है।

पंजाब में, उच्च जातियां, ज्यादातर जाट सिख, खेती के परिदृश्य पर हावी हैं। 2015-16 की कृषि जनगणना के अनुसार, निजी कृषि योग्य भूमि का केवल 3.5 फीसदी दलितों का है, जो 32 फीसदी आबादी का हिस्सा हैं। राष्ट्रीय औसत 16.6 फीसदी दलितों के लिए 8.6 फीसदी कृषि भूमि है।

जाट के स्वामित्व वाले खेतों की हरियाली से हरा चारा लाने के लिए उसे मीलों पैदल चलने के समय को याद करते हुए, हरमौर कौर का शुक्र मनाती हैं कि आम जमीन अब दलितों के पास है। वह कहती हैं, “कभी-कभी ज़मीन का मालिक हमारा पीछा करता है या अभद्र टिप्पणी करता है।”

यौन शोषण महिला मजदूरों के लिए सबसे महत्वपूर्ण खतरों में से एक है, जिनमें से अधिकांश दलित हैं, जैसा कि हाल ही में एक अध्ययन, ‘सोशियो इकोनोमिक कंडिशन एंड द पॉलिटिकल पार्टिसिपेशन ऑफ रुरल वुमन लेबर्रस इन पंजाब’ में बताया है। “यौन शोषण से संबंधित अपने अनुभवों के बारे में पूछे जाने पर 70 फीसदी से अधिक उत्तरदाताओं ने जबान बंद रखा। वास्तविकता का अनुमान इससे लगाया जा सकता है,

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